रख भरोसा भगवान् पे और करम ऐसे किये जा!! भाग जाएगा फिर कोरोना भी बस तू घर के बाहर मत आ !! फैलाना ही है तो दुआ फैला हवा में फिर देख!! यह ज़हर खुद बा खुद ही मर जाएगा !!
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Showing posts from March, 2020
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यह कैसी अनहोनी सी हो रही है इस दुनिया में !! हर कोई क़ैद था यहाँ ज़िन्दगी की बंदिशों में!! तूफ़ान ऐसा आया एक पल में यहाँ !! हर कोई क़ैदी बन कर रह गया मौत की इन लहरों में !! यह कैसी अनहोनी सी हो रही है इस दुनिया में !! हर कोई था क़ैद था यहाँ ज़िन्दगी की बंदिशों में!! आदमी बेजुबान सा खामोश है फुर्सत के इन लम्हों में !! और पछियों की चेहचाहट सुनाई दे रही है इस खुले आसमान में !! यह कैसी अनहोनी सी हो रही है इस दुनिया में !! हर कोई क़ैद था यहाँ ज़िन्दगी की बंदिशों में!! जो कहते थे मरने तक की भी फुर्सत नहीं है !! वह आज मरने के डर से फुर्सत में बैठे हैं !! यह कैसी अनहोनी सी हो रही है इस दुनिया में !! हर कोई क़ैद था यहाँ ज़िन्दगी की बंदिशों में!! हर कोई कहता था वक़्त नहीं है बाकी सब है यहाँ जीने के लिए !! आज वक़्त है और बाकी चीजों की ज़दोजहत में लगे हैं सब ऐ-ज़िन्दगी तुझे जीने के लिए !! यह कैसी अनहोनी सी हो रही है इस दुनिया में !! हर कोई क़ैद था यहाँ ज़िन्दगी की बंदिशों में!! खामोश में भी हूँ बहुत आज यहाँ बैठा हुआ !! बस ढूंढ रहा हूँ अल...
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कैसा ज़हर सा हवा में दुनिया की फ़ैल सा गया है !! एक भारीपन सा भी सांस में मौत का साया सा लगने लगता है !! बहम का सागर फिर इस कदर मन्न में पनपने लगता है !! भगवान् की चौखट भी इंसान से दूर सी हो गयी है अब तो !! ज़िन्दगी सबको प्यारी लगने लगी है अब तो !! कैसा ज़हर सा हवा में दुनिया की फ़ैल सा गया है !! एक भारीपन सा भी सांस में मौत का साया सा लगने लगता है !! हर कोई कमाने में लगा था यु तो अब तक इस शहर में अक्सर!! अब खुद को दुनिया की भीड़ से बचाने में लगा है अब तो !! कैसा ज़हर सा हवा में दुनिया की फ़ैल सा गया है !! एक भारीपन सा भी सांस में मौत का साया सा लगने लगता है !! कभी तो हर पल शोर था इस शहर की हवाओं में और इंसान खामोश सा था !! आज शहर ये खामोश है और शोर सा हर किसी के मन्न में होने लगा है अब तो !! कैसा ज़हर सा हवा में दुनिया की फ़ैल सा गया है !! एक भारीपन सा भी सांस में मौत का साया सा लगने लगता है !! भरी है आज उड़ान पंछियों ने भी बेफिक्र होकर इस खुले आसमान में !! और इंसान अपने ही आशियाने में क़ैद सा हो...
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आवो हवा में शहर की यह कैसा ज़हर फ़ैल सा रहा है !! हर कोई यहाँ खुद के ही घर में जैसी बंदी सा हो गया हो!! यु तो चैहरे पे हर किसी के नक़ाब यहाँ रहता है दोस्तों !! अब चेहरा फिर भी हर कोई यहाँ ढक के चल रहा है !! आवो हवा में शहर की यह कैसा ज़हर फ़ैल सा रहा है !! हर कोई यहाँ खुद के ही घर में जैसी बंदी सा हो गया हो!! सड़कें खाली खाली सी यहाँ आजकल हो गयी हैं !! और मैं सब का यहाँ भरा भरा सा है आजकल !! खुद को कोई बचा रहा है तो किसी को परिवार की अपने परवाह है !! ज़हर फैला सा है यहाँ हवा में भी इसका हर कोई यहाँ गवाह है !! आवो हवा में शहर की यह कैसा ज़हर फ़ैल सा रहा है !! हर कोई यहाँ खुद के ही घर में जैसी बंदी सा हो गया हो!!
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क्यों यु बेबस सा इस कदर है आदमी !! माना के शर्मा हाय है यहाँ लाज़मी!! जिसको शर्म की परवाह थी उसने ख़ामोशी से सब बसर कर लिया !! और जिसको दिखावा चाहिए था उसने दिखा के सब बसर कर लिया !! वक़्त है जनाब!! हर पल करवट बदलता है यहाँ! सब सीखने की आदत की बवह होनी चाहिए यहाँ!! वक़्त लगता है मगर हीरे को भी यहाँ कोयले की खान से तराशने तक के वक़्त को गुजरते हुए गुजारने की काबिलियत होनी चाहिए यहाँ!!
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यूँ ही इक शाम किनारे पर बैठा कुछ सोच रहा था में!! मानो खुद ही में खुद को शायद खोज रहा था मैं !! खुद से खुद का हाल पूछे इक अरसा हो गया था शायद !! इसलिए पुरानी फटी सी जेब को फिर से टटोल रहा था में !! मिल जाए शायद कुछ पुरानी कीमती यादें या फिर मिल जाएँ वह अधूरी फरियादें कहीं !! इसी उम्मीद में पुराने पन्ने किताब के ज़िन्दगी की फिर से खोल रहा था में !! यूँ ही इक शाम किनारे पर बैठा कुछ सोच रहा था में!! मानो खुद ही में खुद को शायद खोज रहा था मैं !! ज़िम्मेबारियों को निभाने की इस दौड़ में पीछे मुड़ कर खुद को फिर से ढूंढ रहा था मैं !! वक़्त भी ऐसे भाग रहा था उस वक़्त मानो जैसे उसके किये हुए गुनाह के सबूत ढूंढ रहा था में !! यूँ ही इक शाम किनारे पर बैठा कुछ सोच रहा था में!! समुन्दर को देखा तो खामोश सा था वोह भी बहुत मानो जैसे वह भी मुझ से कुछ सवाल पूछ रहा हो जैसे !! राज़ जाने इसने कितने खुद में दबाये हुए थे शायद इल्जाम सब उन अधूरी लहलहाती लहरों के उस पर आये हुए थे !! यूँ ही इक शाम किनारे पर बैठा कुछ सोच रहा था में!! मानो खुद ही में खुद ...