ख्वाहिशों की मुठ्ठी में हांथों की अपनी हमने उमीदों के रेत को समेटे रखा है कुछ इस कदर !! जो ढील देता हूँ मुठ्ठी को थोड़ी तो यह फिसलने लगता है !! जो थोड़ा कसता हूँ मुठ्ठी को तो भी यह हाथों से निकलने लगता है !!
कारवां ज़िन्दगी के सफर का इसकुछ इस कदर गुज़र रहा है !! कभी कोई लम्हा सामने से गुज़र रहा है !! कभी कोई अपना पीछे छूट रहा है !! ख़ामोशी भरी मुस्कराहट चेहरे पे सबके झलक रही है !! इस कदर सफर ज़िन्दगी यहाँ हर कोई बसर कर रहा है !!!