ना कुछ कहने की आदत यह मेरी शायद सबको ही बुरी लगती है !! पर वजह इसकी शायद ही कोई जानता है यहाँ !! जुबान मेरी भी अक्सर सब कह देने को मुझसे बहुत लड़ती है !! पर हर बार हार जाती है क्यूंकि मुझे सबके चेहरे पे मुस्कान अच्छी लगती है !!
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Showing posts from April, 2020
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क़हर है यह कुदरत का या फिर सज़ा है यह कोई खुद के गुनाहों की !! मंज़िल तक तो चल पड़े थे हम लेकिन परवाह नहीं थी हमको राहों की !! आज मंज़िल भी बदल गयी और रास्ते बंद सब हो गए !! कुदरत की परवाह न की कभी ,हम कबसे इतने मतलबी हो गए !! पंछियों की चहचहाहट आसमान में अब तो यु गूंजने लगी !! पंछी सब अब आज़ाद हो गए और हम सब क़ैदी हो गए !! क़हर है यह कुदरत का या फिर सज़ा है यह कोई खुद के गुनाहों की !! लगता है दुआ अब तो सब बेजुंबानों की कबूल सी हो गयी !! मौत खुलेआम घूम रही है बेफिक्र सी होकर और ज़िन्दगी खुद के घर में कैद हो गयी !! जो जरुरत कभी हुआ करती थी दुआ में शामिल हर बार!! अब पता चला के वोह जरुरत ही बेमतलब हो गयी !! एक पल में ही मौत ने कीमत ज़िन्दगी की ब्यान कर दी !! कोई कहता है "कोविद-19 " तो कोई कहता है कोरोना !! न निकलो घर से बेवजह तुम भी,बस यही बात तुम मेरी सुनो ना !! क़हर है यह कुदरत का या फिर सज़ा है यह कोई खुद के गुनाहों की !!
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न निकल घर से तू बेवजह , तेरे इस करम की मिलेगी सबको सजा !! अगर थी कोई जरुरी वजह तो आने के बाद बाहर से, धो कर अपने हांथों को बता दे के तुझे भी है सबकी परवाह !! वोह जो अपने अपनों को घर छोड़ कर खुद बाहर निकले हैं हमको बचाने के लिए !! दिन रात लड़ रहे हैं वह वीर "कोरोना" को हराने के लिए !! न निकल घर से तू बेवजह , तेरे इस करम की मिलेगी सबको सजा !! न कर नफरत तू किसी से भी के हाथ आगे बढ़ा सबको जोड़ने के लिए !! दूर रह के सबसे भी तू पास सबके आ सकता है !! फैलाना है तो प्यार फैला तभी यह नफरत का वायरस मर सकता है !! सुना है किसी ने फेंका था पथ्थर उस पर बिना किसी वजह के !! सुना है किसी ने काट दिया उसका हाथ बिना किसी वजह से !! जो अगर लड़ नहीं सकता तू कदम से कदम मिलकर उनसे !! तो न रोक कदम तू उनके,उनकी राहों में पथ्थर बन के !! न निकल घर से तू बेवजह , तेरे इस करम की मिलेगी सबको सजा !! जो कभी करता था दुआ तू हर पल वही दुआ शायद तेरी आज कबूल हुई है !! सड़कें खली हैं तू घर पे है और तेरी दौड़ने की रफ़्तार अब थमी हुई है !! वह भी वीर थे जिन्होंने घर से...
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देख मंज़र अब इस दुनिया का में कुछ इस कदर हैरान हूँ!! जो कभी खवाहिश हुआ करती थी और उसे पूरा इस कदर होते हुए देख के में थोड़ा सा परेशान हूँ !! क्या ख्वाहिशें पूरी हुई हैं आज सबकी या फिर ज़िन्दगी ने करवट यह ऐसी पलटी है !! गलियां सूनी हैं यहाँ परआजकल मगर मन्न सबका कुछ भरा भरा सा है !! हर कोई बैठा है घर में मगर जाने कैसा डर दिल में सबके आज ज़रा ज़रा सा है !! देख मंज़र अब इस दुनिया का में कुछ इस कदर हैरान हूँ!! कभी ज़दो-जेहत में ज़िन्दगी की सुबह से शाम हुआ करती थी यहाँ बंदिशें की सलाखों में अक्सर मैंने बेजुबानो को सब कहते हुए सुना था !! आज आज़ाद हैं पंछी सब इस खुले आसमान में और हालत तड़पते हुए इंसान की इस कदर देख कर में खुद बेजुबान हूँ !! देख मंज़र अब इस दुनिया का में कुछ इस कदर हैरान हूँ!! गलियां सब सूनी सूनी हैं यहाँ और क़ैद हर कोई यहाँ अब इंसान है !! हर कोई सोच में बैठा है यह सोच कर के यहाँ के हाँ में आज परेशान हूँ !! पंछियों की चेहचाहट उनकी ख़ामोशी की आवाज़ अब बन गयी है !! ज़िन्दगी पहले क्या हुआ करती थी और आज क्या ब...
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खवाब तो रोज आते हैं आँखों में पर अधूरे अधूरे से !! अलफ़ाज़ तो तड़फ जाते हैं बयान करने को मगर लफ़ज़ हैं अधूरे अधूरे से !! बयान करना तो है हमको बहुत कुछ ऐ ज़िन्दगी मगर वह लफ़ज़ कहा से लाएं पूरे पूरे से !! खवाब तो रोज आते हैं आँखों में पर अधूरे अधूरे से !! हर रात को नींद टूट जाती है अक्सर और वह एक खवाब अक्सर अधूरा ही रह जाता है !! अब कहाँ से लाएं हम वह नींद आँखों में जिससे खवाब भी देखिए हम पुरे से !! खवाब तो रोज आते हैं आँखों में पर अधूरे अधूरे से !!