ज़िन्दगी शायद यही थी ,जो समझ तो आती थी पर आने पर भी किसी को बताने में अक्सर जुबान लड़खड़ाती थी !! पर एकआज का यह आलम है के ,रूह तक छटपटाती है पर चेहरे पे बस मुस्कराहट ही छलकती है !!!
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Showing posts from May, 2019
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रोज समेटता हु तुझको अपना समझकर ऐ ज़िन्दगी और तू हर रोज बिखर सी जाती है!! क्यों तू अक्सर मुझे अपनी होकर भी एक अजनबी की तरह पेश आती है!! कोई गिला नहीं किया मैंने तुझसे कभी भी बस जैसे तूने दिया में वैसे ही बेखबर होकर बिखर गया!! तूने समेटा नहीं और न ही कभी समझा मुझे बस जीने के लिए जब जब तेरा सहारा माँगा मैंने ,तूने अपना मुँह हमेशा फेर लिया!! रोज समेटता हु तुझको अपना समझकर ऐ ज़िन्दगी और तू हर रोज बिखर सी जाती है!! अनजान नहीं तुझसे तेरी हक़ीक़त जानता हूँ फिर भी तुझे खुश रखने के लिए खुद से खुद की हक़ीक़त छुपाता हूँ ! जाने फिर भी कोई खुश नहीं मुझसे बस यही सोच कर तेरे आगे रोज बिखर जाता हूँ !! कोई शाजिश है तेरी ऐ ज़िन्दगी मेरे खिलाफ शायद कोई और होगी भी शायद ,न तूने समझा मुझे और ईसिस वजह से में अकसर टूट सा जाता हूँ !! रास्ता कठिन है और सांस लेना मुश्किल पर कोई है जिनकी में जरुरत हूँ बस यही सोच कर अक्सर बिना सोचे और डगमगाए ज़िन्दगी के रास्ते पर चला जाता हु!! रोज समेटता हु तुझको अपना समझकर ऐ ज़िन्दगी और तू हर रोज बिखर सी जाती है!! अपने अपनों की यादों का साबुन नुमा मरहम खुद पे ल...
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कहा किस खोज में निकल पड़ा है तू ऐ ज़िन्दगी के मुसाफिर के चल इधर रहा है और निगाहें कहीं और हैं !! न फेर यु नज़र मुझसे तू यु खफा होकर के कह कुछ रहा है और दिखा कुछ और रहा है !! आइना एक दिन पढ़ा था मैंने तेरा तुझे बिन बताये एक दिन के वह बेचारा भी दिख रहा था धुंधला धुंधला मुझको!! खफा था शायद और खफा ही होगा के एक हाथ फेर देता तू भी उसपे कुछ उसको बोलने से पहले !! तब समझ जाता तू भी तेरे यु उस छोटी सी बात को तोलने से पहले के तू जुदा खुदसे है तो मेरी क्या खता उसमें,के तू चाहता तो जोड़ देता शायद उस उम्मीद को में तुझसे, तेरे तोड़ने से पहले!!! कहा किस खोज में निकल पड़ा है तू ऐ ज़िन्दगी के मुसाफिर के चल इधर रहा है और निगाहें कहीं और हैं !! फ़िक्र न कर तू दुनिया की के यह दुनिया है कुछ न कुछ तो कहेगी ही अक्सर, तू चलता जा अपनी मजिल की और बेफिक्र होकर !! साया तेरा में हु मुझसे बयान करदे दिल को खोल कर, कभी लडख़ड़ाएगा तो कभी डगमगाएगा ,सम्भल भी जाएगा तू ठोकर खा कर!! कहा किस खोज में निकल पड़ा है तू ऐ ज़िन्दगी के मुसाफिर के चल इधर रहा है और निगाहें कहीं और हैं !!
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मुझे आगोश में ले लो इस कदर के छुप जाओ तेरी गोद में!! कोई न देख पाए और जी भर के रो लू आज तेरी गोद में !! बहुत कोशिश की पलकों में छुपे इस समुन्दर तो बहा दू !! पर कम्बखत यह भी साथ नहीं छोड़ते इस ज़िन्दगी की होड़ में!! सोचा एक पल छुप जाऊ कही तो शायद बह जाएंगे यह भी मेरी खोज में!! के ख़ुशी तो नहीं पर दर्द से भी गहरा नाता है अपना और बास हम थे के चल पड़े उसे ढूंढने की खोज में!! सब देखा सब जगह ढूंढा मगर वह सुक्कुन ना मिला हमें जो मिला है खुल के रो लेने में छुपकर तेरी गोद में!! मुझे आगोश में ले लो इस कदर के छुप जाओ तेरी गोद में!! कोई न देख पाए और जी भर के रो लू आज तेरी गोद में !!