यूँ ही इक शाम किनारे पर बैठा कुछ सोच रहा था में!!
मानो खुद ही में खुद को शायद खोज रहा था मैं !!

खुद से खुद का हाल पूछे इक अरसा हो गया था शायद !!
इसलिए पुरानी फटी सी जेब को फिर से टटोल रहा था में !!
मिल जाए शायद कुछ पुरानी कीमती यादें या फिर मिल जाएँ वह अधूरी फरियादें कहीं !!
इसी उम्मीद में पुराने पन्ने  किताब के ज़िन्दगी की फिर से खोल रहा था में !!

यूँ ही इक शाम किनारे पर बैठा कुछ सोच रहा था में!!
मानो खुद ही में खुद को शायद खोज रहा था मैं !!

ज़िम्मेबारियों को निभाने की इस दौड़ में पीछे मुड़ कर खुद को फिर से ढूंढ  रहा था मैं !!
वक़्त भी ऐसे भाग रहा था उस वक़्त  मानो जैसे उसके किये हुए गुनाह के सबूत ढूंढ रहा था में !!
यूँ ही इक शाम किनारे पर बैठा कुछ सोच रहा था में!!
समुन्दर को देखा तो खामोश सा था वोह  भी बहुत  मानो जैसे वह भी मुझ से कुछ सवाल पूछ रहा हो जैसे !!
राज़ जाने इसने कितने खुद में दबाये हुए थे शायद इल्जाम सब उन अधूरी लहलहाती लहरों के उस पर आये हुए थे !!

यूँ ही इक शाम किनारे पर बैठा कुछ सोच रहा था में!!
मानो खुद ही में खुद को शायद खोज रहा था मैं !!

एक लहर मेरा पास आते आते मानो जैसे खामोश सी हो कर बापिस चली गयी !!
लगता है एक बार कोशिश उसकी किनारा पाने की फिर से नाकाम हो गयी हो जैसे !!!








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