क़हर है यह कुदरत का या फिर सज़ा है यह कोई खुद के गुनाहों की !!
मंज़िल तक तो चल पड़े थे हम लेकिन परवाह नहीं थी हमको राहों की !!
आज मंज़िल भी बदल गयी और रास्ते बंद सब हो गए !!
कुदरत की परवाह न की कभी ,हम कबसे इतने मतलबी हो गए !!
पंछियों की चहचहाहट आसमान में अब तो यु गूंजने लगी !!
पंछी सब अब आज़ाद हो गए और हम सब क़ैदी हो गए !!
क़हर है यह कुदरत का या फिर सज़ा है यह कोई खुद के गुनाहों की !!
लगता है दुआ अब तो सब बेजुंबानों की कबूल सी हो गयी !!
मौत खुलेआम घूम रही है बेफिक्र सी होकर और ज़िन्दगी खुद के घर में कैद हो गयी !!
जो जरुरत कभी हुआ करती थी दुआ में शामिल हर बार!!
अब पता चला के वोह जरुरत ही बेमतलब हो गयी !!
एक पल में ही मौत ने कीमत ज़िन्दगी की ब्यान कर दी !!
कोई कहता है "कोविद-19 " तो कोई कहता है कोरोना !!
न निकलो घर से बेवजह तुम भी,बस यही बात तुम मेरी सुनो ना !!
क़हर है यह कुदरत का या फिर सज़ा है यह कोई खुद के गुनाहों की !!
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