कहा किस खोज में निकल पड़ा है तू ऐ ज़िन्दगी के मुसाफिर के चल इधर रहा है और निगाहें कहीं और हैं !!
न फेर यु नज़र मुझसे तू यु खफा होकर के कह कुछ रहा है और दिखा कुछ और रहा है !!
आइना एक दिन पढ़ा था मैंने तेरा तुझे बिन बताये एक दिन के वह बेचारा भी दिख रहा था धुंधला धुंधला मुझको!!
खफा था शायद और खफा ही होगा के एक हाथ फेर देता तू भी उसपे कुछ उसको बोलने से पहले !!
तब समझ जाता तू भी  तेरे यु उस छोटी सी बात को तोलने से पहले के तू जुदा  खुदसे है तो मेरी क्या खता  उसमें,के तू चाहता तो जोड़ देता शायद उस उम्मीद को में तुझसे, तेरे तोड़ने से पहले!!!

कहा किस खोज में निकल पड़ा है तू ऐ ज़िन्दगी के मुसाफिर के चल इधर रहा है और निगाहें कहीं और हैं !!

फ़िक्र न कर तू दुनिया की के यह दुनिया है कुछ न कुछ तो कहेगी ही अक्सर, तू चलता जा अपनी मजिल की और बेफिक्र होकर !!
साया तेरा में हु मुझसे बयान करदे दिल को खोल कर, कभी लडख़ड़ाएगा तो कभी डगमगाएगा ,सम्भल भी जाएगा तू ठोकर खा कर!!

कहा किस खोज में निकल पड़ा है तू ऐ ज़िन्दगी के मुसाफिर के चल इधर रहा है और निगाहें कहीं और हैं !!

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