रोज समेटता हु तुझको अपना समझकर ऐ ज़िन्दगी और तू हर रोज बिखर सी जाती है!!
क्यों तू अक्सर मुझे अपनी होकर भी एक अजनबी की तरह पेश आती है!!
कोई गिला नहीं किया मैंने तुझसे कभी भी बस जैसे तूने दिया में वैसे ही बेखबर होकर बिखर गया!!
तूने समेटा नहीं और न ही कभी समझा मुझे बस जीने के लिए जब जब तेरा सहारा माँगा मैंने ,तूने अपना मुँह हमेशा फेर लिया!!

रोज समेटता हु तुझको अपना समझकर ऐ ज़िन्दगी और तू हर रोज बिखर सी जाती है!!

अनजान नहीं तुझसे तेरी हक़ीक़त जानता हूँ फिर भी तुझे खुश रखने के लिए खुद से खुद की हक़ीक़त छुपाता हूँ !
जाने फिर भी कोई खुश नहीं मुझसे बस यही सोच कर तेरे आगे रोज बिखर जाता हूँ !!

कोई शाजिश है तेरी ऐ ज़िन्दगी मेरे खिलाफ शायद कोई और होगी भी शायद ,न तूने समझा मुझे और ईसिस वजह से में अकसर टूट सा जाता हूँ !!
रास्ता कठिन है और सांस लेना मुश्किल पर कोई है जिनकी में जरुरत हूँ बस यही सोच कर अक्सर बिना सोचे और डगमगाए ज़िन्दगी के रास्ते पर चला जाता हु!!

रोज समेटता हु तुझको अपना समझकर ऐ ज़िन्दगी और तू हर रोज बिखर सी जाती है!!

अपने अपनों की यादों का साबुन नुमा मरहम खुद पे लगा के अपने अरमानो के लहू से अक्सर रोज नहाता हूँ !!
यही ज़िन्दगी है शायद ,ऐसी ही होगी बस यही सोचकर में रोज ऐ ज़िन्दगी तुझे जिए जाता हूँ !!

रोज समेटता हु तुझको अपना समझकर ऐ ज़िन्दगी और तू हर रोज बिखर सी जाती है!!

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