निकल पड़ा वह यु बेपरवाह सा थोड़ा निराश सा तो थोड़ा नाउम्मीद सा !!
ज़िम्मेदारी का बोझ उसके कन्धों को झुकाये जा रहा था !!
 और अपनों का भूखा पेट उसे रुलाये जा रहा था !!
कोरोना जैसी दानव ने रोजगार उसका छीन लिया था शायद !!
सुना था के वह अपने कल की ज़िन्दगी के लिए अपना एक घर बना रहा था !!
दीवारें अधूरी ही रह गयी थी ,शायद उमीदें भी कहाँ  उसे अब पूरी रह गयी थी !!
कर के वह फैसला अपनों को लेकर निकल गया अपने गाँव की और !!
पर होनी को तो मंजूर था शायद कुछ और !!
छाले पाओं के उसके, सफर के उसके की  कहानी व्यान कर रहे हैं !!
कोई भूखा ,कोई टूटा है हर कोई यहाँ इस सफर में !!
क्या मंज़िल मिलेगी या फिर कोई भयानक हादसा होगा अब इस सफर में !!

घर पर रहें !! सुरक्षित रहें !!


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