मंज़र आज यह कैसा इस महफ़िल में छाया हुआ सा है !!
के हर किसी की जुबान कुछ और कह रही हो और नज़रें कुछ और !!
ऐसे मंज़र में मैं किसे पराया समझू और किसे अपना !!
के हर कोई साथ अपने यहाँ कई चेहरे ले के आया हो जैसे !!
के हर किसी की जुबान कुछ और कह रही हो और नज़रें कुछ और !!
ऐसे मंज़र में मैं किसे पराया समझू और किसे अपना !!
के हर कोई साथ अपने यहाँ कई चेहरे ले के आया हो जैसे !!
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