ख़ामोशी  से कहूँ या फिर में करूँ ब्यान लफ़्ज़ों में !!
जियूँ  तुझे या फिर करूँ गुमान तुझे जीने के एहसासों में !!
कभी लफ़ज़ ही नहीं मिले जब भी तेरी असलियत को ब्यान करना चाहा मैंने !!
तो कभी वह एहसास ही न ज़ाहिर हुए जब तुझे ख़ामोशी से समझाना चाहा मैंने !!
ज़िन्दगी तेरी  कहानी का हर एक पन्ना मेरी एहसासों की स्याही से थोड़ा रंगा भी है !!
और कुछ  जज़्बातों की ख़ामोशी से कोई पन्ना भरा भी है !!
जीने लफ़्ज़ों को समझा उसने उतना ही पढ़ा ज़िन्दगी की किताब को !!
और किसी ने कोशिश तक भी न की उस खली पैन को समझने की जिसमें अलफ़ाज़ तो न थे पर फिर भी भरा पड़ा था कुछ अनकहे एहसासों से !!


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