वोह बचपन मेरा कहीं  खो गया है !!

वोह आँगन मेरे घर का और वोह गालियां मेरे गाँव की !!
याद आती है अक्सर उस खेत के पेड़ की छाओं की !!
वह मासूमियत वक़्त के समुन्दर में जाने कहा खो गयी !!
इस रफ़्तार भरी जिदो-जेहत में ज़िन्दगी जाने कब कहा सो गयी !!

वोह बचपन मेरा कहीं  खो गया है !!

वोह बारिश की बूंदों का मिटटी में मिलके समां वह महका देना !!
याद आता है बहुत मुझको वह पानी में कश्ती को बहा देना !!
वह बारिश कहा गयी और वह कश्ती जाने कहा खो गयी !!
इस रफ़्तार भरी जिदो-जेहत में ज़िन्दगी जाने कब कहा सो गयी !!

वोह बचपन मेरा कहीं  खो गया है !!

वोह  बेफिक्र सा हर पल रहना और खेतों में पंछियों की चहचहाट का सुनना !!
हर ख़ुशी उस लम्हे के साथ कही खो गयी !! लगता है के ज़िन्दगी अब बड़ी हो गयी !!
वोह आँगन में मेरे घर के यूं वक़्त का गुजारना !!
के बहुत याद आता है मुझको वह बात बात पर झगड़ना !!

वोह बचपन मेरा कहीं  खो गया है !!












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