कभी  कह नहीं पाता  कभी खुले आम किसी से भी वह अक्सर अल्फ़ाज़ बनाकर कागज़ पर उतार देता हु!!
ऐ ज़िन्दगी के तेरे सामने में कहा अक्सर टिकता हु!!
तेरी भी ज़िद है मुझे हर कदम पर लड़खड़ाया हुआ देखने की !!
और मेरे इरादे हैं गिल कर भी संभल कर मज़िल की और भाड़ जाने के!!

कभी  कह नहीं पाता  कभी खुले आम किसी से भी वह अक्सर अल्फ़ाज़ बनाकर कागज़ पर उतार देता हु!!

तू पल पल साथ रहकर हर लम्हे में डगमगा देती है मुझे
और में हर बार उठ खड़ा हो जाता हु तुझ से जीत जाने के लिए !!
न तू कभी जीतेगी और न कभी में हार मानूंगा !!
बस यु ही ख़ामोशी से आगे बढ़ता चला जाऊंगा !!!

कभी  कह नहीं पाता  कभी खुले आम किसी से भी वह अक्सर अल्फ़ाज़ बनाकर कागज़ पर उतार देता हु!!

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