में तुझसे पूछता हु तो तू कुछ बताती नहीं है ज़िन्दगी ,
ऐसा भी क्या राज़ है जो तूने खुद में छुपाये रखा है !!
खामोश तो है तू पर अक्सर बातें भी बहुत करती है मुझसे,क हम क्यों भटकते रहते हैं अकसर तुझे ढूंढने में !!
उलझन यह कैसी है और क्यों यह उलझन है!ऐसा लगता है क मौत प्यासी है उम्मीद के इस दरिया में ,

में तुझसे कुछ पूछता हु और तू कुछ बताती नहीं है
ज़िन्दगी,ऐसा भी क्या राज़ है जो तूने खुद में छुपाये रखा है !!

चाह नहीं है कोई किसी उम्मीद के बचने की ,रूबरू सा एक साया ऐसा यहाँ क्यों है !!
जो तड़पता भी है इस उम्मीद के दरिया में और जो बिलखता भी  जैसे यहाँ ,कैसा यह साया है !!

कही यह मेरे खुद की हक़ीक़त तो नहीं !!

में तुझसे कुछ पूछता हु और तू कुछ बताती नहीं है ज़िन्दगी,
ऐसा भी क्या राज़ है जो तूने खुद में छुपाये रखा है !!

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